Wednesday, August 3, 2011

ईशावास्य उपनिषद


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 ईशावास्य उपनिषद / बसन्त
           
   AUTHOR OF HINDI VERSE        
 PROF BASANT PRABHAT JOSHI
   
उन्हें समर्पित ज्ञान प्रिय, रखते मम से प्रीति 


पूर्ण हैं प्रभु, पूर्ण यह जग,
पूर्ण से जग पूर्ण है,
पूर्णता से पूर्ण घट कर,
पूर्णता ही शेष है.



ईश समाया जगत  में
जगत ईश परिपूर्ण 
त्यागी बन भोगो जगत
नहीं वृत्ति पर अर्थ.1.



कर्तव्य कर्म आधार बन,
भोगे जीवन शरद सत
निष्काम कर्म आधार हैं
अन्य राह नहीं यहाँ.2.


अज्ञान से आवृत्त हैं,
असुर नाम सब लोक 
जो अपने ही शत्रु हैं,
प्रेत प्राप्त बस लोक.3.


मन बुद्धि से पर परम
कूटस्थ है परब्रह्म
अचल पर वह नित चले,
प्राण वायु का प्राण.4.


अचल होकर नित चले,
दूर रह यह पास
सब में रहता नित सदा.
है विलक्षण सर्वदा.5. . 



जो सब में मैं देखता,
मैं देखे सर्वत्र
राग द्वेष से मुक्त वह
सदा आत्म स्वरूप.6.


सब भूतों में देखता
अपना शुद्ध स्वरूप
शोक मोह नहीं वहाँ
जुड़ा सकल जग भूत.7. 


परम पवित्र निर्विकार,
स्वयं भू सर्वज्ञ
निराकार परम बोध
रचे प्रजापति आदि.8.
(प्रजापति का अर्थ है अहँकार ,बुद्धि मन, ज्ञानेन्द्रियाँ आदि )


अंध लोक में कर प्रवेश
भ्रम में, विद्या  हीन
घोर अंध में जात वे
जो विद्या विद्वान .9.


विद्या और अविद्या का
भिन्न भिन्न परिणाम
धीर पुरुषों का यह वचन,
जाना ज्ञान विशेष.10.
( सांसारिक विद्या अविद्या कहलाती है,परमार्थिक विद्या, विद्या कहलाती है. )




विद्या  और अविद्या का   
तात्विक जाने ज्ञान    
अविद्या मृत्यु को पार कर
विद्यामृत सो प्राप्त .11.


अंध लोक में जात 
वे जो माया के दास 
घोर अंध में जात वे 
जिन  पूजा अभिमान .12.

प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष का
भिन्न भिन्न परिणाम
विज्ञ जानते भेद को,
दिया हमें वह ज्ञान.13.
प्रत्यक्ष ज्ञान संसारी ज्ञान को कहते हैं, इसे आसुरी ज्ञान  (manifested)  भी कहा है. देवीय ज्ञान  (unmanifested) अप्रत्यक्ष ज्ञान कहा गया है.



प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष को 
सदा जानते विज्ञ
मृत्यु भय से मुक्त हो
अमृत प्राप्त सम्भूत.14.


स्वर्ण पात्र से है ढका
सत् का मुख यह जान
प्रभु खोलो इस पात्र को
सत्य ज्ञान पहिचान .15.



व्यूह रश्मि समेट लो,
दर्शन हों  प्रत्यक्ष
कल्याण रूप दर्शन करूं
आत्म रूप सो पुरुष मैं.16.



देह भस्म हो अग्नि में,
प्राण वायु में लीन
स्व निमग्न रत कर्म मम
स्मर स्मर ओम् ध्यान.17.


हे! अनल मय ईश हमको
अभ्युदय को ले चलो
कर्म मम से विज्ञ होकर
नाश कर दो पाप को
नमन मम स्वीकार हो  
नमन मम स्वीकार हो.18.

           ॐ तत् सत् 

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